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डॉ०आंबेडकर के बिना अधूरा है भारत -

डॉ०आंबेडकर के बिना अधूरा है भारत,महापरिनिर्वाण दिवस पर आदरांजलि 20वीं शताब्दी के श्रेष्ठ चिन्तक, ओजस्वी लेखक, तथा यशस्वी वक्ता एवं स्वतंत्र भार त के प्रथम कानून मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माणकर्ता हैं। विधि विशेषज्ञ, अथक परिश्रमी एवं उत्कृष्ट कौशल के धनी व उदारवादी, परन्तु सुदृण व्यक्ति के रूप में डॉ. आंबेडकर ने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. आंबेडकर को भारतीय संविधान का जनक कहा जाता  है। डॉ. आंबेडकर ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पहले एम. ए. तथा बाद में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की । उनके शोध का विषय “भारत का राष्ट्रीय लाभ” था। इस शोध के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई। 1923 में बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की अनेक कठनाईयों के बावजूद अपने कार्य में निरंतर आगे बढते रहे। डॉ. आंबेडकर की लोकतंत्र में गहरी आस्था थी। वह इसे मानव की एक पद्धति (Way of Life) मानते थे। उनकी दृष्टी में राज्य एक मानव निर्मित संस्था है। इसका सबसे बङा कार्य “समाज की आन्तरिक अव्यवस्था और बाह्य अतिक्रमण से रक्षा करना है।“ परन्तु वे राज्य को निरपेक्ष शक्ति नही मानते थे

ज़ेल जा सकते है आप नेता कुमार विश्वास -

यूपी के बुलंदशहर में कुमार विश्वास उर्फ मनीष शर्मा पर बाबा साहब पर टिप्पणी करने पर हुआ मुकदमा दर्ज- आप नेता कुमार विश्वास उर्फ मनीष शर्मा ने सविंधान निर्माता, भारत रत्न बाबा साहेब डॉ०भीमराव अंबेडकर जी पर आपत्ति जनक व जाति सूचक टिप्पणी कर बुरे फ़स गए है | राजस्थान में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कुमार विश्वास ने कहा था की   "एक आदमी आरक्षण के नाम पर आंदोलन कर गया था एक आदमी (अम्बेडकर) यहाँ  आकर जाति का बीज बो गया था । उससे पहले यहां जाति वाद नहीं था । सब मिलकर रहते थे ।  आप नेता कुमार विश्वास ने कहा मेरे गाँव में  एक मेहतरानी मेरी दादी के साथ ब्याह कर साथ आई थी  वह मेहतरानी हमारे घर की बहू को घूंघट न करने पर हजार गालियां सुनाकर चली जाती थी और हम उसे कुछ नहीं कहते थे । यानी इतनी इज्जत थी उसकी। " कुमार विश्वास की कही हुई बातो से सम्पूर्ण दलित समुदाय और विभिन्न सामाजिक संघटनो ने आपत्ति दर्ज कराई है | उ नका का कहना है की आप नेता कुमार विश्वास सस्ती लोकप्रियता के लिए डॉ बाबा  साहब जैसे महापुरुष पर ऐसे अपशब्द का प्रयोग कर गठिया राजनीती  कर रहे है आज बुलंदशहर में कुमार विश्वास उ

बाबा साहेब द्वारा बनाया गया "भारतीय सविंधान" भारत को सदियों तक ऊर्जावान रखेगा- कपिल गौतम प्रेम

  सविंधान दिवस विशेष - बाबा साहेब द्वारा बनाया गया सविंधान सदियों तक भारत को ऊर्जावान बनाये रखेगा- कपिल गौतम प्रेम सविंधान महज एक औपचारिकता नही है यह एक समाज,एक गांव,एक देश सभी को ध्यान में रखकर और सभी अंगों से मिलकर बना है। 26 नवंबर 1949 को बाबा साहेब डॉ०आंबेडकर ने सविंधान को प्रस्तुत किया और अंगीकार कर भारत के लोगों को सौंप दिया गया।सविंधान दिवस पर अगर डॉ०आंबेडकर को याद ना किया जाए तो यह एकदम अधूरा है आइये एक नजर डालते हैं हम कैसे बने इस सविंधान के अंग-भारतीय राजनीति व समाज के ऐतिहासिक परिदृश्य में, डॉ. भीमराव अंबेडकर का उदय एक ऐसे जननेता के रूप में हुआ जिसने व्यक्तिगत संघर्ष की बुनियाद पर अपना सारा जीवन समाज की मुख्यधारा से विमुख, जीवन-यापन कर रहे, वंचितों, शोषितों, पीड़ितों के हक की लड़ाई में समर्पित कर दिया। समग्र विकास की उनकी यह विचारधारा (दृष्टिकोण) संविधान निर्माण के दौरान भी परिलक्षित हुई, जो समानता व सर्वकल्याण की वैचारिकी पर केंद्रित है। तत्कालीन परिस्थिति में संविधान का निर्माण निश्चय ही एक दुरुह कार्य था। ऐसे मुश्किल वक्त में बाबा साहेब ने बड़े ही धीरज के साथ प्रारूप समि

कांशीराम को जिंदा कर दिया सामाजिक कार्यकर्ता कपिल प्रेम ने-

        कांशीराम............ मान्यवर दीनाभाना ने जब मान्यवर कांशीराम को यशकायी डीके खापर्डे से मिलवाया तो उन्होनें मा. कांशीराम साहब को बाबा साहब की पुस्तक एनिहिलेशन आफ कास्ट पढने के लिए दिया। मा. कांशीराम ने बाबा साहब की पुस्तक एनिहिलेशन आफ कास्ट को तीन बार पढा और आन्दोलित हो गये। यहां से मा. कांशीराम का जीवन और उनका उद्देश्य पूर्णत: बदल गया एवं यहीं से मा. कांशीराम के जीवन में एक नयी स्फुर्ति आयी और उन्होंने मा. डीके खापर्डे, मा. दीनाभाना एवं अन्य साथियों के मिलाकर भारत में बहुजन आन्दोलन की शुरूआत की। मा. कांशीराम ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के आ न्दोलन का गहन अध्ययन किया तो इन्होंने देखा कि बाबा साहब के परिनिर्वाण के बाद उनका कारवां रूक गया है। इसलिए जहां-जहां से कारवां रुका था वहां-वहां से पुनः हमें आंदोलन रिस्टार्ट करना पडेगा। इसके बाद वे जी जान से इसे दोबारा से शुरू करने में जुट गए।   पूना पैक्ट का धिक्कार:- मा. कांशीराम इस नतीजे पर पहुंचे कि अछूतों को मिलने वाले पृथक निर्वाचन के अधिकार को पूना पैक्ट ने समाप्त कर दिया और वह हथियार जो अछूतों को मिला था उसे गांधी जी ने पूना पै