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आदिवासियों की नियति तो देखिये चूहे गिलहरी खाने को है मजबूर ...

झारखंड में गरीब आदिवासियों की नियति तो देखिये चूहे गिलहरी और खरगोश हैं इनके निवाले में..... झारखंड में गरीब आदिवासियों की नियति तो देखिये चूहे] गिलहरी और खरगोश हैं इनके निवाले में झारखंड की कहानी ट्रायबल पिंकी की जुबानी सोमनाथ आर्य रांची: मैं, ट्रायबल पिंकी… मैं ब्रेकफास्ट में चूहे, लंच में गिलहरी और डिनर में खरगोश खाती हूं … ये कड़वा सच है अपने झारखंड का। सबका साथ सबका विकास के नारे इस कठोर के आगे महज मजाक बनकर रह जाती है। बड़ी हिम्मत चाहिये इस सच को स्वीकार करने के लिए, यकीं नहीं तो साहेबगंज के राजमहल पहाड़ी के निकट उत्क्रमित मध्यविद्यालय चुआ चले जायें। जहां आपको मिलेंगी उम्मीद और नाउम्मीदी की दर्जनों लकीरें लिये महज नौ साल की पिंकी पहाड़िन। यही टाइटल है और यही नाम स्कूल के रजिस्टर में है दर्ज। अपनी मां की गुलाबी रंगीन दुपट्टा ओढ़े पिंकी के चेहरे पर हलांकि मुस्कान तो है, लेकिन यह मासूम बचपन का सहज श्रृंगार नजर आता है। पिंकी जब अपनी जुबान से स्कूल में कभी नहीं मिलने वाली मिड डे मिल के बारे में कहती है, तो कोई खास अचरच नहीं होता, लेकिन जब कहती है कि वह खाने के लिए चूहे, गिलहरी और खरगोशों का